बुद्धगम्य  बनाने के लिए मैं फिर कहता हूँ  कि यह गाँठ आपको आँख से दिखती है, यद्यपि यहाँ कपड़ा भी तुम्हें दिखेगा।  यह गाँठ आँख से दिख गई और आँख से दिख गई कि  अब नहीं रही । एक छोटा बच्चा जिस के आँखें हों उसको ले आना।  मैं पूछूँगा, वह कहेगा कि यह गाँठ है और खोलने के बाद पूछूँगा तो कहेगा कि अब नहीं है । फिर मैं पूछूँगा कपड़ा .? तो बाकी जगह कहेगा कपड़ा और इसे कहेगा गाँठ। अब यहाँ बिना समझ के कोई नहीं कह सकता कि जहाँ गाँठ है वहाँ कपड़ा है । जहाँ गाँठ है वहाँ भी कपड़ा है। जहाँ जीव है, देह है वहाँ भी परमात्मा है। जीव बिना परमात्मा के हो नहीं सकता। जीव स्वतंत्र नहीं है । हम त्रैतवादी हैं लेकिन हम त्रैत सत्यवादी नहीं हैं । त्रैतवादी हैं पर तीन को सत्य नहीं मानते । सत्य एक को मानते हैं ।                        

“एकमेवाद्वितीय ब्रह्म।”      

फर्क समझ लें,  हम गाँठ नहीं मानते; ऐसा नहीं है।  लेकिन सत्य हम  कपड़े को मानते हैं, गाँठ को नहीं मानते । जीव मानते हैं, जीव का वर्णन है, जीव की अवस्थाओं का वर्णन है, जीव के बंधन का,  जन्म का वर्णन है पर जीवो ब्रह्मैव नापरः  का भी वर्णन है । 


अब स्थूल जगत क्षर, इसका रहना, न रहना, होना, न होना देखते रहते हो। पर जिसके द्वारा यह देह का होना और न होना देखा जाता है उसको अभी हम अक्षर मान लेते हैं। बचपन का न रहना  जिसने न जाना हो वह जरा  बताए? आपने अपने बचपन का रहना देखा था ना ? बचपन रहा है न? और अभी क्या है आपका? बच्चों को मैं नहीं पूछता उनका अभी है और वे यह भी जान सकते हैं कि आगे बचपन नहीं रहेगा। आपका हमारा बचपन रहा है पर आज नहीं है। यह तुमने ही तो देखा। अपने बचपन को आपने ही तो देखा था ना?  किससे  देखा? आँखों से? बिना आँखों वाले बच्चे तो होते ही नहीं हैं? अपने बचपन का रहना और न रहना अंधे तो जानते ही नहीं हैं? 
इसका मतलब अपने बचपन का होना, बचपन का न रहना, ताकत का होना, ताकत का घटना, क्या यह इंद्रियों से जानते हो?  जाग्रतावस्था का होना फिर जाग्रत का न रहना, स्वपनों का होना, स्वपनों का न रहना,  सुषुप्ति का होना और सुषुप्ति का न रहना आप जानते हैं ना?  इनके चश्मदीद गवाह है ना,  स्वयं प्रमाण है ना, तो कौन प्रमाण है  ये आँखें? जाग्रत, स्वपन, सुषुप्ति क्या अंधों की नहीं होती,  बहरों की नहीं होती? 


ये जब होते हैं तो इनका होना बिना किसी के कैसे जाना जाएगा? जैसे बाहर के विषय इँद्रियों से जाने जाते हैं ऐसे ही सूक्ष्म अवस्थाएं साक्षी के रहते चेतन से जानी जाती हैं । बिना चेतन के जागना क्या हो सकता है?  अभी खुर्दबीन (Microscope) लगाइए, हटाइए। कुछ चीजें दिखने लगती हैं कुछ दिखनी बंद हो जाती हैं। मशीन के कारण कुछ दिखने लगा,  मशीन के हटाने से न दिखने लगा नेत्र के रहते। ऐसे ही साक्षी के रहते उपकरण बदला,  जाग्रतावस्था रही तो जगत दिखा । इस जगत के होने को हम कुछ नहीं कहते। जाग्रत हो जाने से जगत दिखने लगता है। जगत अपनी जगह ज्यों का त्यों है, चित्रकूट अपनी जगह, बांदा जिला, सतना जिला अपनी जगह, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश अपनी जगह, पूरे देश-विदेश, विश्व  अपनी जगह सिर्फ जाग्रत अवस्था नहीं तो जगत आपको नहीं दिखता। यह नियम सब जाति- मजहबों पर लागू है।

इसलिए अध्यात्म एक ऐसी विद्या है जो रिलीजन से ऊपर है। यह किसी रिलीजन की मोहताज नहीं है।  यदि रिलीजन ने किसी को अंधा नहीं बनाया,  ब्लाइंड फेथ नहीं दिया, रिलीजन ने आँखें  बंद नहीं की, आँखें यदि खुली हैं, कौन सी आँखें?  समझ वाली आँखें , तो हर रिलीजन वाला देख सकता है कि जाग्रत में ही जगत दिखता है  इसलिए जाग्रत में दिखने के कारण इस जगत का नाम जाग्रत जगत है।

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