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ध्यान दें

जो लोग रात 12 बजे मनाते हैं जन्मदिन
उन्हें कुछ बातों की जानकारी होना आवश्यक है..

एक अजीब सी प्रथा इन दिनों चल पड़ी है वो है ..रात 12 बजे शुभकामनाएं देने और जन्मदिन मनाने की। लेकिन क्या आपको पता है भारतीय शास्त्र इसे गलत मानता है .. हम आपको यही अवगत कराने प्रयास कर रहे हैं कि वास्तव में ऐसा करना कितना अजीब है..

आजकल किसी का बर्थडे हो, शादी की सालगिरह हो या फिर कोई और अवसर क्यों ना हो, रात के बारह बजे केक काटना लेटेस्ट फैशन बन गया है। लोग इस बात को लेकर उत्साहित रहते हैं कि रात को बारह बजे केक काटना है

अक्सर ऐसा देखा जाता है कि लोग अपना जन्मदिन 12 बजे यानि निशीथ काल ( प्रेत काल) में मनाते हैं। । निशीथ काल रात्रि को वह समय है जो समान्यत: रात 12 बजे से रात 3 बजे की बीच होता है। आमजन इसे मध्यरात्रि या अर्ध रात्रि काल कहते हैं। शास्त्रनुसार यह समय अदृश्य शक्तियों, भूत व पिशाच का काल होता है। इस समय में यह शक्ति अत्यधिक रूप से प्रबल हो जाती हैं।

हम जहां रहते हैं वहां कई ऐसी शक्तियां होती हैं, जो हमें दिखाई नहीं देतीं, किंतु बहुधा हम पर “प्रतिकूल” प्रभाव डालती हैं जिससे हमारा जीवन अस्त-व्यस्त हो उठता है और हम दिशाहीन हो जाते हैं। जन्मदिन की पार्टी में अक्सर मदिरा व मांस का चलन होता है। ऐसे में प्रेतकाल में केक काटकर, मदिरा व मांस का सेवन करने से अदृश्य शक्तियां व्यक्ति की आयु व भाग्य में कमी करती हैं और दुर्भाग्य उसके द्वार पर दस्तक देता है। साल के कुछ दिनों को छोड़कर जैसे दीपावली, 4 नवरात्रि, जन्माष्टमी व शिवरात्रि पर निशीथ काल महानिशीथ काल बन कर शुभ प्रभाव देता है जबकि अन्य समय में दूषित प्रभाव देता है।

शास्त्रों के अनुसार रात के समय दी गई शुभकामनाएं प्रतिकूल फल देती हैं

हिन्दू शास्त्रों के अनुसार दिन की शुरुआत सूर्योदय के साथ ही होती है और यही समय ऋषि-मुनियों के तप का भी होता है। इसलिए इस कला में वातावरण शुद्ध और नकारात्मकता विहीन होता है। ऐसे में शास्त्रों के अनुसार सूर्योदय होने के बाद ही व्यक्ति को बर्थडे विश करना चाहिए क्योंकि “रात के समय” वातावरण में रज और तम  कणों की मात्रा अत्याधिक होती है और उस समय दी गई बधाई या शुभकामनाएं फलदायी ना होकर प्रतिकूल बन जाती हैं।

खैर ये सारी शास्त्रोक्त बातें हैं आप अगर इन्हें नज़रअंदाज़ भी कर दें पर क्या अपने ह्रदय की भावनाओं और संवेदनाओं को साक्षी मान कर सोचिए वो सुबह कितनी अविस्मरणीय होती है जब आप रात को जल्दी सोकर सुबह जल्दी उठे थे। और किसी ने आपको आपके शरीर के इस प्राकट्य दिवस पर शुभकामनाएं या कोई तोहफा दिया था।

ये जीवन आपका है। आप सोचें कि कैसे जीना है। बस एक बात हमेशा याद रखें बड़े भाग्य से ये मनुष्य जीवन मिलता है इसे जितना प्राकृतिक होकर जिया जा सकता है जियें।

“शयन के नियम”

  1. सूने तथा निर्जन घर में अकेला नहीं सोना चाहिए। “देव मन्दिर” और #श्मशान में भी नहीं सोना चाहिए – “#मनुस्मृति”
  2. किसी सोए हुए मनुष्य को अचानक नहीं जगाना चाहिए – “#विष्णुस्मृति”
  3. विद्यार्थी, नौकर औऱ द्वारपाल, यदि ये अधिक समय से सोए हुए हों, तो इन्हें जगा देना चाहिए – “#चाणक्यनीति”
  4. स्वस्थ मनुष्य को आयुरक्षा हेतु #ब्रह्ममुहुर्त में उठना चाहिए। (देवीभागवत) बिल्कुल अँधेरे कमरे में नहीं सोना चाहिए – “#पद्मपुराण”
  5. भीगे पैर नहीं सोना चाहिए। सूखे पैर सोने से लक्ष्मी (धन) की प्राप्ति होती है। (अत्रिस्मृति) टूटी खाट पर तथा जूठे मुँह सोना वर्जित है – “#महाभारत”
  6. “नग्न होकर/निर्वस्त्र” नहीं सोना चाहिए -“#गौतमधर्मसूत्र”
  7. पूर्व की ओर सिर करके सोने से #विद्या, पश्चिम की ओर सिर करके सोने से प्रबल चिन्ता, #उत्तर की ओर सिर करके सोने से हानि व मृत्यु तथा #दक्षिण की ओर सिर करके सोने से धन व आयु की प्राप्ति होती है – “आचारमय़ूख”
  8. दिन में कभी नहीं सोना चाहिए। परन्तु “#ज्येष्ठ_मास” में दोपहर के समय 1 मुहूर्त (48 मिनट) के लिए सोया जा सकता है। (दिन में सोने से रोग घेरते हैं तथा आयु का क्षरण होता है)
  9. दिन में तथा सूर्योदय एवं सूर्यास्त के समय सोने वाला रोगी और दरिद्र हो जाता है – “#ब्रह्मवैवर्तपुराण”
  10. सूर्यास्त के एक प्रहर (लगभग 3 घण्टे) के बाद ही शयन करना चाहिए।
  11. बायीं करवट सोना स्वास्थ्य के लिये हितकर है।
  12. दक्षिण दिशा में पाँव करके कभी नहीं सोना चाहिए। यम और दुष्ट देवों का निवास रहता है। कान में हवा भरती है। मस्तिष्क में रक्त का संचार कम को जाता है, स्मृति- भ्रंश, मौत व असंख्य बीमारियाँ होती है।
  13. हृदय पर हाथ रखकर, छत के “पाट या बीम” के नीचे और पाँव पर पाँव चढ़ाकर निद्रा न लें।
  14. शय्या पर बैठकर “खाना-पीना” अशुभ है।
  15. सोते सोते “पढ़ना” नहीं चाहिए। (ऐसा करने से नेत्र ज्योति घटती है )
  16. ललाट पर “तिलक” लगाकर सोना “अशुभ” है। इसलिये सोते समय तिलक हटा दें।

इन १६ नियमों का अनुकरण करने वाला यशस्वी, निरोग और दीर्घायु हो जाता है।

निर्ममेति

एक बार दीपक कहने लगा कि “जिस घर में मैं जलता हूं, उस घर में मैं अंधेरे को नहीं आने देता”। हमने कहा भई! ज्यादा न बोलो, जरा संभल के बोलो। ये कहो “जहां मैं रहता हूं, वहां अंधेरा आता ही नहीं है”। वहां अंधेरा रहता नहीं कि तू आने नहीं देता? अंधेरे को तो कोई धक्का दिये रहता है , जो नहीं आने देता । कोई रोके रहता है उसे?
“मेरा है ” कहते ही बंधन..
अभी जब यहां सत्संग चल रहा था, हम लाउडस्पीकरों की आवाज सुन रहे थे। इधर चार स्पीकर लगे हैं, उधर दो लगे हैं। हम खड़े होकर यह पता लगा रहे थे कि कहां की आवाज सुन रहे हैं? एक बालिश्त के फर्क में हम इधर के स्पीकरों की आवाज सुनते थे। और एक बालिश्त के फर्क से खड़े होते ही यह बिल्कुल ही नहीं लगता कि यह आवाज होती है। केवल एक बालिश्त की दूरी का यह प्रभाव है। सच तो यह है कि एक बाल बराबर दूरी का भी यही प्रभाव होगा। यदि मशीन से सुना जाए, तो बाल बराबर इधर आते ही यह आवाज़ सुनोगे और बाल बराबर उधर जाते ही वह आवाज़ सुनोगे। एक सीमा रेखा होती है, बस इतना ही फर्क है।
जब भौतिक जगत् में, एक बाल बराबर दूरी से इतना फर्क पड़ सकता है, तो “मेरा नहीं है , भगवान का है” की जमीन पर खड़े होते ही, बस इतना सा ख्याल करते ही, आदमी मुक्त हो जाता है और “मेरा है” यह ख्याल आते ही वह बंध जाता है, फंस जाता है।

“द्वे पदे बंद मोक्षाय निर्ममेति ममेति च।
ममेति बध्यते जन् र्तनिर्ममेति विमुच्यते।।”

“निर्ममेति”, “मेरा नहीं है”, कहते ही मुक्त हो जाता है और “मेरा है”, कहते ही बंध जाता है। मैं कहता हूं, यह तो एक सूत्र है। ऋषियों ने ऐसे लाखों सूत्र दिए हैं। एक भी सूत्र पकड़ लो, तो मुक्त हो जाओगे।

मन का ज्ञाता साक्षी


मन जिससे महसूस होता हो; मन जिसके पहले न रहा हो; जिसने मन के होने को समझा हो, जिसे मन के विलय होने का पता रहता हो; जिसे मन के सो जाने का पता रहता हो; ऐसा जिसको पता चलता हो, उसी को तुम ब्रह्म जान लेना।
“तदेव ब्रह्मत्वं विद्धि”
ब्रह्म को इन्द्रियों की सीमा में मत खोजते रहना ।
गो गोचर जहं लगि मन जाई।
सो सब माया जानेहु भाई।।”
मन की सीमा में यदि परमात्मा मिल भी जाए; इंद्रियों की सीमा में परमात्मा आ भी जाए; तो वह परमात्मा का साकार रूप होगा, आराध्य रूप होगा। वह भी हमारे कल्याण का कारण बन सकता है; लेकिन, मृत्यु भय साकार भगवान से नहीं जाता। किसी भी साकार भगवान के दर्शन से, उनके मिलने से, मृत्यु भय नहीं गया। उनके उपदेश की बात मैं नहीं कहता।
अर्जुन भगवान के साथ ही तो था। उसका शोक नहीं गया; मृत्यु भय नहीं गया; राग-द्वेष नहीं गया। भगवान को उपदेश ही देना पड़ा। मान लो कि मैं भगवान हूं। क्या मेरे देखने से आपका अभिमान चला जाएगा? मेरे देख लेने के बाद, यदि आपको सांप काट ले, तो मरने के भय में फर्क पड़ेगा? क्या हो जाएगा? देह वाले की मौत वैसे ही रहेगी; चाहे भगवान नहीं भगवान के बाप ही क्यों न हों। मेरे ख्याल से भगवान के तो बाप ही नहीं होता। क्यों! भगवान के भी बाप होता होगा? भगवान तो होता ही सब का बाप है; इसलिए, भगवान का कोई बाप नहीं होता। भगवान बिना बाप का होता है। जो बिना बाप का होता है, उसी का नाम भगवान है । समझ गए! जो बिना बाप के हो, अर्थात अजन्मा हो आत्मा हो जिसने अपने भीतर उसकी उपस्थिति को समझ लिया हो, वही परमात्मा है। जिसका जन्म ही नहीं होता, उसका बाप कैसे होगा? वही बापों के बाप के बाप तुम भी हो सकते हो सिर्फ इस ब्रह्म ज्ञान का पान तो ठीक से करो।

परमधाम

अब एक शर्त है कि पहले यह जो “मैं” चेतन है, इस चेतनता को जागृत रखूं; क्योंकि मैं जागृत में ही मिल सकता हूं। यद्यपि मैं सुषुप्ति में देह से संबंध नहीं रखूंगा; परंतु नींद मुझे इतना दबोचेगी कि मुझे अपना ही होश नहीं रहेगा। ब्रह्म का होश कौन करेगा? ब्रह्म का होश, ब्रह्म में स्थित होने का एहसास मैं नींद में कैसे कर सकूंगा?—यद्यपि जब जीव को नींद आ जाती है तब जगत से संबंध टूट जाता है और नींद में ब्रह्म निरीह होता है। परंतु ऐसा ब्रह्म होने से क्या लेना – देना?—यदि नींद में ब्रह्म मिला तो जागृत में भी तो ब्रह्म से ही मिला है। ब्रह्म से अलग तो जीव हो ही नहीं सकता।
जागृत में चेतना की जो दिशा दृश्य की ओर है; वह चेतन की ओर हो जाए। अर्थात चेतन जीव चेतन आत्मा में है, ऐसा ख्याल करें। “मैं” जो हूं निर्विकार चेतन में हूं, “मैं” निराकार चेतन में हूं, “मैं” अनादि – अनंत चेतन में हूं, “मैं” संसार में रहने वाले ब्रह्म चेतन में हूं। मेरा निवास “ब्रह्म” में है, “चैतन्य” में है और मैं चेतन रहकर ही यह जानूं।
यह ध्यान रहे कि जिस समय आप चेतन नहीं रहेंगे, नींद में हो जाएंगे तो खो देंगे। इसीलिए मैं चेतन रहकर यह जान लूं फिर मुझे नींद आये, कोई हर्ज नहीं। नींद तो आएगी, नींद का विरोध भी नहीं है। बस, आप जागृत अवस्था में अपने को चैतन्य हुआ अनुभव करें। इसीलिए हम चेतन को अपना धाम मांगते हैं। जहां रहा जाए, उसे क्या बोलते हैं? धाम या घर। वैष्णव लोग परमात्मा को भी धाम कहते हैं। “अहं ब्रह्म परं धाम” यहां ब्रह्म को परमधाम कहा गया है। जो परमधाम है, उसमें मैं रहूं। जो परम चेतन है, जो अखंड चेतन है, उस चैतन्य में रहता हुआ अनुभव करूं। मैं चैतन्य में हूं, देह में नहीं।

गुरूदीक्षा

गूरू के पास अज्ञानी बनकर जाना चाहिए!
ज्ञान हमेशा झुककर हासिल किया जा सकता है।
एक शिष्य गुरू के पास आया। शिष्य पंडित था और मशहूर भी, गुरू से भी ज्यादा। सारे शास्त्र उसे कंठस्थ थे। समस्या यह थी कि सभी शास्त्र कंठस्थ होने के बाद भी वह सत्य की खोज नहीं कर सका था। ऐसे में जीवन के अंतिम क्षणों में उसने गुरू की तलाश शुरू की। संयोग से गुरू मिल गए। वह उनकी शरण में पहुंचा।

गुरू ने पंडित की तरफ देखा और कहा, ‘तुम लिख लाओ कि तुम क्या-क्या जानते हो। तुम जो जानते हो, फिर उसकी क्या बात करनी है। तुम जो नहीं जानते हो, वह तुम्हें बता दूंगा।’ शिष्य को वापस आने में सालभर लग गया, क्योंकि उसे तो बहुत शास्त्र याद थे। वह सब लिखता ही रहा, लिखता ही रहा। कई हजार पृष्ठ भर गए। पोथी लेकर आया। गुरू ने फिर कहा, ‘यह बहुत ज्यादा है। मैं बूढ़ा हो गया। मेरी मृत्यु करीब है। इतना न पढ़ सकूंगा। तुम इसे संक्षिप्त कर लाओ, सार लिख लाओ।’

पंडित फिर चला गया। तीन महीने लग गए। अब केवल सौ पृष्ठ थे। गुरू ने कहा, मैं ‘यह भी ज्यादा है। इसे और संक्षिप्त कर लाओ।’ कुछ समय बाद शिष्य लौटा। एक ही पन्ने पर सार-सूत्र लिख लाया था, लेकिन गुरू बिल्कुल मरने के करीब थे। कहा, ‘तुम्हारे लिए ही रूका हूं। तुम्हें समझ कब आएगी? और संक्षिप्त कर लाओ।’ शिष्य को होश आया। भागा दूसरे कमरे से एक खाली कागज ले आया। गुरू के हाथ में खाली कागज दिया। गुरू ने कहा, ‘अब तुम शिष्य हुए। मुझसे तुम्हारा संबंध बना रहेगा।’ कोरा कागज लाने का अर्थ हुआ, मुझे कुछ भी पता नहीं, मैं अज्ञानी हूं। जो ऐसे भाव रख सके गुरू के पास, वही शिष्य है।

गुरु की बुद्धि

यह शरीर रथ है, इन्द्रियां घोड़े हैं, मन लगाम है, बुद्धि सारथी है, आत्मा रथी है। चाहे कितना अच्छा रथी हो, यदि सारथी चाहे तो रोड में उतर जाये, गड्ढे में डाल दे। यह बुद्धि तुम्हें मार भी सकती है, गिरा भी सकती है, और बचा भी सकती है और यही बुद्धि तुम्हें लक्ष्य तक पहुंचा सकती है।

यह आत्मा – परमात्मा सारी बातें बुद्धि के हाथ में है। यह बुद्धि ही तो आदमी बना दे या ब्रह्म बना दे। ‘देहोअहम् से शिवोहम्’ बना दे।

“मैं ब्रह्म हूँ” ;यह बुद्धि बनी रहे। जैसे आदमी होना एक समझ से स्वीकारा। मैं पैदा हुआ, बूढ़ा हो जाऊंगा, आदमी के धर्म आपको समझ आ गये। यदि ब्रह्म का समझ आ जाये कि मैं ब्रह्म हूँ तो आप नहीं मरोगे।


परन्तु देहाध्यास जन्म से है और ब्रह्माभ्यास बिना गुरु के नहीं हो सकता। इसके लिए गुरु से “मैं ब्रह्म हूँ” यह समझ आ जाय फिर बार – बार ब्रह्माभ्यास हो सकता है। एक बार यह जानना जरुरी है तभी ध्यान और इसका अभ्यास बढ़ेगा।


मैं होश में हूँ तो दुख – चिंता, मान – अपमान या संसारी विषय आ रहे हैं परन्तु पूर्ण होश होने से ये पता चलते हुए भी विचलित नहीं कर सकते।


गुरु के कृपा द्वारा बुद्धि जाग्रत हो। मैं अपने आप में पूर्ण शुद्ध हूँ। यह सही – सही समझ आ जाये। यही “ज्ञान समाधि” है।


मैं ब्रह्म हूँ, मैं ब्रह्म हूँ ‘शब्द दोहराओगे’ मैं ब्रह्म हूँ ‘का मतलब सर्वत्र मैं हूं, सब में’ मैं ‘हूँ। यह गुरु द्वारा दी हुई बुद्धि के द्वारा ही जाना जा सकता है।

धार्मिक चित्त

एक -दूसरे के विरोध के नमूने भारत और विदेश हैं। आजकल के साधुओं और गृहस्थों को पूर्णता की उपलब्धि नहीं हुई। भारत, विदेश के विज्ञान का भूखा है और विदेश भारत के अध्यात्म के भूखे हैं। गृहस्थ भोगों से अतृप्त है, शांति का भूखा है तथा सामान्य साधु – समाज, अर्थ और आश्रय का भूखा है और इसी के पाने की चिंता में निमग्न है। साधुओं में इन्हीं के लिए संघर्ष होते हैं। आवश्यकताओं की पूर्ति न होने से चित्त अंतर्मुख और शांत नहीं हो पाता। अशान्त और बहिर्मुख चित्त दृढ़ आत्मस्मृति को भी उपलब्ध नहीं होता। अतः, पदार्था भाव में आवश्यकताओं की पूर्ति न होने से अध्यात्मिक साधन भी असंभव हो जाते हैं और चित्त पदार्थों की तरफ गतिमान होने लगता है। धर्म के अभाव में चित्त, आत्मा, परमात्मा, सत्य, मुक्ति और शांति इनके विषय में बिल्कुल ही अपरिचित रह जाता है। इनकी खोज में धार्मिक चित्त ही प्रवृत्त होता है। जो इनकी खोज में साधन रत है, उसी को मैं धार्मिक चित्त कहता हूं।
धर्मविहीन जीवन बिल्कुल बाह्य हो जाता है। उसका उद्देश्य शरीर – रक्षा, भोग -प्राप्ति, महत्त्वाकांक्षा और अधिकार- रक्षा का रूप ले लेता है। वह कठिन से कठिन श्रम करके भी इन इच्छाओं की पूर्ति नहीं कर पाता; क्योंकि; बाह्य पहलू-बाहर की यात्रा, “क्षितिज” को छूने जैसा प्रयास है; जो सदा समीप, पृथ्वी को छूता हुआ और प्राप्य भासता है। किंतु, “क्षितिज” की प्राप्ति, कठिन ही नहीं असम्भव है। मृगतृष्णा का जल दिखता है, पर, प्राप्त नहीं होता। और इसी इक्क्षा में मनुष्य जन्म जन्मांतरों तक भटकता रहता है। उसे चाहिये कि किसी ब्रह्मनिष्ठ गुरु को खोजे उनकी शरण जाए और इसे समझे यही मानव मात्र का ध्येय और उद्देश्य होना चाहिए। यही धर्म का विज्ञान है, धर्म है। धर्म अनुशासन सिखाता है और अनुशाषित व्यक्ति ही स्वयं को जीत सकता है ये कोई बाहरी लड़ाई नही सिर्फ अंतर युद्ध शिक्षा देता है।

भोग-योग रूप

पुरुष और प्रकृति, इन दोनों के मेल से जिन जीवो का जन्म हुआ है, वे जन्म से शरीराभिमानी ही होते हैं। वे अपने को शरीर मानते हुए ही पैदा होते हैं और शरीर मानते हुए ही प्राय: मर जाते हैं। कोई ऐसे भी हैं, जो कितनी ही बार जन्म लेने पर भी बार-बार शरीर भाव को ही प्राप्त होते हैं। ऐसे कुछ ही महान् पुरुष होते हैं, जो शरीर में रहते हुए भी, शरीर भाव से मुक्त होकर, अपने परमात्मभाव को प्राप्त होते हैं। जैसे कोई जन्म से लड़की हो और बाद में लड़का हो जाए। पहले माता की तरह हो, पीछे पिता की तरह हो जाए। इसी प्रकार, जीव पहले जन्म – मरण वाला हो, सुख-दुख वाला हो, कर्ता और भोक्ता हो; बाद में अकर्त्ता, अभोक्ता और आनंदमय हो जाए। भोग से व्यक्ति प्रकृति रूप और योग से ब्रह्मरूप बन जाता है।
यदि कोई आत्मा को अनुभव करेगा, तो परमात्मा भाव को प्राप्त होगा और यदि प्रकृति के साथ, शरीर के साथ तादात्म्य करेगा, तो जड़ता को प्राप्त होगा; मरण को प्राप्त होगा। इस प्रकार दो भावों वाला यह जीव ही हो सकता है। परमात्मा नित्य परमात्मा है; प्रकृति नित्य प्रकृति है। यह जीव ही प्रकृतिभाव वाला और परमात्मभाव वाला होता है।
अब आपको यह देखना है कि आप जिस भाव में हैं, उस भाव में आपको चैन है? जैसे कोई लड़की हो और उसे लड़की के जीवन में चैन ना हो -पीड़ा होती हो कि वह लड़का होती तो अच्छा होता। उसी प्रकार से हमारे जीवन में भी एक पीड़ा है। हम अभी लड़की की तरह हो गए हैं। हम प्रकृति के भाव वाले शरीर के रूप में पैदा हो गए हैं। हमें लगता है कि हम मरे नहीं, दुखी ना हो, अशान्त न हों और परेशान न हों। हमारे हृदय में एक ऐसी पीड़ा है, जो हमें भगवान् होने को बाध्य करती है। यदि हम भगवान के भाव को प्राप्त न हों या भगवान् हमें प्राप्त न हों, तो हमको जीवन में चैन नहीं आता। इसीलिए, जहां शरीर की व्यवस्था का प्रश्न है, वहीं जीव की आंतरिक मांग का सवाल भी हमारे सामने रहता है।

जागो

आपने स्वप्न में क्या नहीं देखा! सब कुछ देखा पर झूठा देखा! पर वह कब समझ आया? जब जग गए! अब क्या करना है? यह जो इस समय देख रहे हो जागृत में, यह सब स्वप्न है !सब सपना है! सब सपना है !सत्य केवल आत्मा, दृष्टा मैं हूं! यह जागृत में स्मरण करो!
दृष्टा सत्य है, दृश्य स्वप्न है। यद्यद द्रष्टं तद्तद अनित्यम्।। जो जो दिखाई देता है अनित्य है। जो दिखता है सब मिथ्या है, सब झूठ है। जो जो मालूम पड़ता है सब झूठा है आत्मा के सिवाय, ऐसा ध्यान करो। यह एक विधि है ध्यान की। फिर दोहरा दे……. सुविधा के लिए आकाश का ध्यान करो, पिता का ध्यान करो, गुरु का ध्यान करो, राम भगवान, कृष्ण भगवान का ध्यान करो। दूसरा नींद का ध्यान करो, तीसरा स्वप्न का ध्यान करो। सब कुछ देखा था पर कोई सच था क्या? अभी जो देख रहे हो सब सपना है। आखरी स्टेज होती है, लोग पूछते हैं, हमसे भी पूछते हैं, यह तो कुछ कुछ समझ जाता है कि हम दृष्टा है, पर हम ब्रह्म हैं यह समझ नहीं आता और स्वप्न और जागने की पहचान क्या है? स्वप्न में एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं है जो स्वप्न में स्वप्न  का दृष्टा ना हो। स्वप्न में दृष्टा है तभी तो स्वप्न देख रहा था। स्वप्न के दृष्टा तुम ही थे पर स्वप्न में तुम्हें सबके दृष्टा हो यह नहीं पता था। तुम देख तो रहे थे, अभी भी देख रहे हो ना? मुझे देख रहे हो, पंडाल देख रहे हो, प्रयागराज देख रहे हो। देख तो रहे हो! ऐसे ही स्वप्न में देख रहे थे पर स्वप्न में बहुत चेतन थे, अनेकों चेतन थे, अनेकों दृष्टा थे, अनेकों व्यक्ति थे, और मैं भी था। इतने सत्य थे पर जागे तो पता चला कि केवल मैं सत्य था और सब सपना था । कब पता चला? जागने पर!! इसलिए जाग कर समझना ज़रूरी है। जागो और जागे हुए ही सोचो की सच में तुम्हें क्या लगता है, क्या सच है अंततः तुम्हें यही मिलेगा।