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इतनी सी बात समझ गए, मानो सब समझ गए


हमनेे देखा कि बहुत लहरें हैं, पूछा कि कहीं पानी भी है? तो लहरों ने साफ इंकार कर दिया कि पानी है ही नहीं। जब हमने बहुत कहा कि जरा तुम देखो तो की लहरें कब से बनी हो? उन्होंने कहा इतने दिन से। हमने कहा इससे पहले क्या था? उन्हें कुछ सोचना पड़ा । हमने पूछा कि तुम कितने दिन रहोगी? तो उन्होंने कहा इतने दिन तो लगभग रहेंगी ही। हमने कहा इसके बाद क्या होगा ? उन्होंने कहा कि कुछ पता नहीं। हमने कहा उस पता नहीं की ओर भी जरा जाओ तो? लहर तो यहां से यहां तक है। इस के अगल-बगल क्या है? तब उनको मानना पड़ा कि कुछ है जरूर। इसके बाद उन्होंने स्वीकार किया कि पानी भी है। फिर हमने पूछा कि लहर है और पानी है, तो इन दोनों में से तुम क्या हो? उसने कहा लहर का तो मुझे अनुभव हो रहा है; परंतु, मुझे लगता है कि मैं कुछ और हूं। तब उसने कहा कि पानी हूं और पानी ही लहर है। फिर हमने कहा कि जरा देखो लहर कितनी है और पानी कितना है? तो उसने ढूंढना शुरू कर दिया। इसके बाद उसने स्वयं कह दिया कि लहर है ही नहीं, सिर्फ पानी है । हमने कहा कि और क्या बचता है? तो उसने कह दिया कि और कुछ नहीं बचता है, रह जाता है केवल पानी।
इसी प्रकार से अगर हम अपने अन्दर जागें, तृप्त होने लग जाएं, तो फिर जिसको हम कहते हैं ‘नहीं है’, वही रह जाएगा और जिसको हम कहते हैं ‘यह है’, वह सब खो जाएगा। आज जो कुछ है, वह नहीं है और आज जो कुछ तुम्हारे लिए नहीं है ,वह है। इसीलिए, हम जिस परमात्मा को इन्कार करते हैं, वह है और जिसको हम स्वीकार किए बैठे हैं कि ‘यह है ‘, वह नहीं है। पहले यह खोएगा और वही होगा। उसके बाद वही रह जाएगा और जो भी कुछ होगा, वह वही रह जाएगा। फिर सब कुछ वही है। इस प्रकार से हमको अपने अंदर प्रवेश पाना है। इसके भी द्वार खोलने हैं, जिसके दरवाजे आज तक बंद हैं।

जगत बना है हमसे

जो चेतन सब जगह भरपूर है, कहीं कम ज्यादा नहीं वह सिर्फ वहा मालूम पड़ता है जहां मन बुद्धि है, बस यही जीवाध्यास है, यही बंधन है, यही समस्या है । तो…… सब जगह बराबर! और
एतावदेव जीज्ञास्यं तत्व जिज्ञासुनात्मना। अन्वयव्यतिरेकाभ्यां यत् स्यात सर्वत्र सर्वदा।।

जो चेतन सर्वत्र है, सदा है, एक समान है और एक रस है ,जरा भी कम ज्यादा नहीं अब ऐसा चेतन हमको अपने में एक रस नहीं मालूम पड़ता। चेतन सर्वत्र तो मालूम ही नहीं पड़ता और जहा मालूम पड़ता है वहां भी एक रस मालूम नहीं पड़ता। जाग्रत में, स्वप्न में, सुषुप्ति में चेतन बदल जाता है ऐसा लगता है , जग जाता है, सो जाता है ऐसा लगता है। तो अभी आप आत्मा और ब्रह्म को जल्दी स्वीकार करें या ना करें पर ग्रंथ कहते हैं कि वह एक ही है , एक रस है, साक्षी हैं । करोड़ों नास्तिक स्वीकार नहीं करते इस बात को । तो जो स्वीकार नहीं करते वह नास्तिक और जो स्वीकार करते हुए नहीं मालूम पड़ता वे आस्तिक। स्वीकार तो करते हैं कि एक रस है, सर्वत्र हैं ,एक है। ना नहीं करते पर मालूम नहीं पड़ता। ऐसे ही हम पहले एक बात करेंगे कि जहां चेतन मालूम पड़ता है। चेतन सब जगह मालूम नहीं पड़ता क्योंकि दो चीजें जानी गई-
यत् स्यात सर्वत्र सर्वदा। तो अभी हम सर्वदा पर विचार करते हैं। सब जगह चेतन नहीं मालूम पड़ता यह तो मालूम पड़ता है पर (अपनी और हाथ दिखाते हुए )यदि यहां चेतन ना मालूम पड़ता तो समस्या ही कोई नहीं थी । यदि चेतनता आपको मालूम ही नहीं पड़ती की हूं तो दुख क्या था? बंधन क्या था ? चिंता क्या थी? चेतन सब जगह मालूम नहीं पड़ता जहा देह, मन, बुद्धि है वहां मालूम पड़ता है। तो जब चेतन एक रस है तो कभी मालूम पड़ता है कभी मालूम नहीं पड़ता यही चक्कर है। एक रस, सदा, सर्वत्र तो छोड़ दिया। अब विचार करना है तत् पद और त्वं पद पर। तत् पद भी अभी छोड़ दें विचार करे त्वं पद। तुम या मैं। मैं भी एक समान चेतन हूं यह मालूम नहीं पड़ता। चेतन हो जाता हूं, जड़ हो जाता हूं, जग जाता हूं, सो जाता हूं ऐसा मालूम पड़ता है। हमारे गुरुदेव इसके विषय में क्या कहते थे! चेतन वहाँ मालूम पड़ता है जहां मन बुद्धि है और मन बुद्धि एक समान रहते नहीं इसलिए कभी मालूम पड़ते हैं कभी नहीं। और जहां मन बुद्धि नहीं है वहाँ मालूम ही नहीं पड़ता। तो सर्वत्र नहीं मालूम पड़ने का कारण सब जगह मन बुद्धि का अभाव। और एक जगह भी एक समान मालूम नहीं पड़ता क्योंकि मालूम पड़ते हैं मन बुद्धि के कारण और मन बुद्धि एक समान रहते नहीं। तो एक समान हम हैं ऐसा मालूम ही नहीं पड़ता।

नित्य दो हैं। परमात्मा नित्य है, जीव नित्य है और यह प्रवाह चलता रहता है। अर्थात् अगला जन्म और देह की प्राप्ति होती रहती है। यद्यपि बीच में छूटता भी है जैसे, जगने के बाद सोना और सोने के बाद जगना। यह जगना सोना खत्म नहीं हो रहा, चल रहा है। वैसे तो रोज खत्म होता है लेकिन फिर भी चल रहा है। खत्म होने का मतलब यह नहीं कि खत्म हो ही गया। खाना रोज खत्म करते हो कि नहीं? देखो, खाते-खाते खाना बंद कर देते हैं फिर भी एक अर्थ में बंद नहीं करते। अभी बंद कर दिया कुछ देर बाद फिर भूख लगी, फिर खा लिया। इसी तरह सृष्टि और शरीर की प्राप्ति भी होती रहती है। यह बंद नहीं होती। एक शरीर छूटा, दूसरा मिलेगा। दूसरा शरीर छूटा तीसरा मिलेगा।

पुनरपि जननं पुनरपि मरणं पुनरपि जननी जठरे शयनम्।
ये शब्द आदि शंकराचार्य ने कहे हैं । ये शब्द किसी वैष्णव के नहीं हैं। इसका मतलब, देह की मृत्यु को वह भी इंकार नहीं करते। हाँ, उपाय कर रहे हैं कि यह ना हो। नास्तिक लोग शरीर को ही मैं मानते हैं, जीव भाव को नहीं मानते, आगे जन्म नहीं मानते। इसलिए वे मृत्यु को प्राप्त होते हैं। मैं एकबार रूस में बोला था कि नास्तिकता से मृत्यु की प्राप्ति होती है। जीव भाव से पुनर्जन्म होता है। पुनर्जन्म से एक तरह से अमृत की प्राप्ति हुई। हम मृत्यु को प्राप्त नहीं होंगे, भले ही अगला जन्म हो । अर्थात् मृत्यु से हम बच गए।

गुरुदेव का वाक्य है जो हम सुना करते थे, हम कोई नई बात नहीं कहते। सूकर खेत में तुलसीदास ने सुनी थी तो वे कहते हैं कि तब मुझ में अज्ञान था, तब मैंने समझी नहीं। अब गुरु जी नहीं है तो समझ में आ गई। क्योंकि तब तो उनके पास रहते थे। जैसे कुत्ता या छोटा बच्चा अपने मालिक के साथ साथ जब रहता है तो निश्चिंत रहता है, ऐसे ही उस समय अपने को कोई परवाह ही नहीं थी। तो गुरुदेव यह कहा करते थे कि जब मैं नहीं रहूंगा तब लोग कहेंगे तुम अपने को ब्रह्म कहते हो, तब पता चलेगा! तो जैसे तुलसीदास जी को उस समय समझ नहीं आई पर जो सुना था तब नहीं, बाद में समझ आई। तो गुरुदेव कहते थे-

जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति, है बुद्धि की अवस्था
जगती है बुद्धि तुम जगे लगने लगते हो, आती है बुद्धि तुम आए लगते हो, सोती है बुद्धि तुम सोए लगने लगते हो, होती है बुद्धि तुम हूं लगने लगते हो। बुद्धि के कारण तुम हूं लगने लगते हो और बुद्धि जब नहीं रहती, लगना बंद हो जाता है। कहीं चले जाते हो ?मर जाते हो? ऐसा कुछ नहीं है ।इसलिए बुद्धि के कारण जितना मालूम पड़ता है बुद्धि के ही कारण बदलता भी रहता दिखता है। तो बुद्धि के रहते जब यह भ्रम टूट जाए कि मैं केवल बुद्धि तक नहीं हूं, जब बुद्धि नहीं थी मैं तब भी था और जहां बुद्धि नहीं है वहां भी मैं हूं, यह स्वीकार करना बहुत श्रद्धा का काम है! इसलिए श्रद्धावान लभते ज्ञानम्
केवल तर्क ही नहीं श्रद्धा! क्योंकि बार-बार हमारी बुद्धि कहेगी ‘मैं यहां नहीं हूं’ और हम देह में हैं! कब तक देह में है यह पता चलता है? जब तक मन, बुद्धि है। बुद्धि के न रहने पर आप देह में थे? कहां थे? तो सारी अनुभूतियां हमारी मन बुद्धि पर निर्भर है। पर थोड़ा सा श्रद्धा से समझोगे तो जब बुद्धि नहीं रहती नींद में, सुषुप्ति में तब देह आदि का विशेष ध्यान ही नहीं होता। जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति है बुद्धि की अवस्था!
मैें बुद्धि से परे हूं याते सदा शिवोsहम्।।

बुद्धि का आश्रय भी मैं ही हूं। तो बुद्धि का आश्रय मैं हूं और बुद्धि प्रत्यय जितने हैं उन अनुभूतियों का आश्रय भी मैं ही हूं साक्षी। इसलिए मैं बुद्धि से परे हूं! याते सदा शिवोsहम्! अब सदा शिव हूं ,कल्याण रूप हूं, जगता सोता नहीं हूं। बुद्धि से परे भी हूं और बुद्धि को धरे भी हूं। पर ऐसा भी नहीं ,जब बुद्धि है तब उसका आश्रय हूं। जैसे घड़े आदि उपाधि की मिट्टी आश्रय भी है। घड़ा किस में रहेगा? स्वतंत्र तो रह नहीं सकता तो कोई अनुभूति….. चाहे जागृत हो, स्वप्न या सुषुप्ति हो, कोई अनुभूति चेतन का आश्रय लिए बिना रह ही नहीं सकती। यहां तक यदि कोई यह सोचे कि इतनी देर मैं नहीं रहा। यदि यह सच्चा अनुभव है कि मैं नहीं रहा, अनुभव हुआ भले चाहे जैसा हो, यदि यह अनुभव हुआ तो किसे हुआ होगा आपके बिना? यदि अपने न रहने का आपको अनुभव हो गया कि इतनी देर मैं नहीं था या मुझे होश नहीं था तो होश के अभाव का साक्षी चेतन ही रहा होगा। यह कोई जड़ कहेगा क्या? क्या यह कोई जड़ कहेगा? इसका मतलब बेहोशी का साक्षी भी चेतन होता है। इसलिए बाहर भीतर एक रस जो चेतन भरपूर। विभु नभ सम सो ब्रह्म है ,नहीं नेरे नहीं दूर

चेतन कभी दूर भी नहीं होता। जागृत कभी दूर हो जाता है, सपना नजदीक हो जाता है। कभी नींद बहुत नजदीक होती है, कभी नींद चली जाती है। यह सब नेरे हो जाते हैं , दूर हो जाते हैं। पर अपना आप कब नेरे होगा? कब दूर होगा ? इसलिए नहीं नेरे नहीं दूर अपना आप कभी नजदीक नहीं होता, अपना आप कभी दूर नहीं होता अपने से। इसलिए दूर और पास होना, होना और खो जाना, जागना और सो जाना मायामात्र है सच्चाई नहीं। आत्मा को सही सही जानकर कोई कर्तव्य मोक्ष के लिए शेष नहीं रहता तो देखो जैसे मिट्टी घड़े के कभी पास हो सकती है, कभी घड़े का अभाव हो सकता है। कभी घड़ा है मिट्टी में, कभी नहीं। कहीं है कहीं नहीं। आपमें कभी अंतःकरण है कभी नहीं है। कभी कोई अवस्था है कभी नहीं है। आप कब अपने पास नहीं है? कब नहीं है? पर हममें ये अवस्थाएं है ही नहीं इसलिए इसको कहेंगे अनात्माध्यास। अनात्म में आत्मबुद्धि। यह मुझे “मैं” लगते हैं तो इन का अभाव मुझे मैं का अभाव लगता है। जागना मुझे अपना जागना लगता है। इसलिए जागने का अभाव मुझे अपना सोना लगता है। जबकि जागना और जागने का अभाव दोनों मेरे बिना नहीं हो सकते ।मेरे बिना जागना-सोना संभव ही नहीं। लेकिन यह गुरुदेव से सुना ,जाने क्या कहते थे……… ‘भ्रम ना सकै कोउ टार’
रजत सीपी मां भास जिमी यथा भानु कर बारि।

यद्यपि मृषा तिहूं काल में भ्रम ना सकै कोउ टार।।
गुरुदेव यह भी बोल देते थे कोई नहीं टाल सकता? गुरुजी को यह पसंद नहीं था। तो हमारा कैसे गया? (महाराज जी की तरफ देखते हुए) आपका कैसे गया? कोउ ना टार सकै यह गड़बड़ है ,तो कहते थे भ्रमण यह “भ्रमना” सकै कोउ टार । यह भ्रमना कोई कोई टार सकता है। भ्रमना अर्थात यह भटकना सकै कोउ टार अर्थात कोई टाल सकता है। यह गुरुदेव का तर्क है। हमारे गुरुदेव पढ़े नहीं थे पर ऐसा कुछ नहीं है जो क्लियर नहीं करते थे। इसी तरह यह जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति का बुद्धि से परे हूं यह तो लिखा है पर गुरुदेव “बुद्धि को धरे हूं” अपनी तरफ से बोलते थे। ऐसे ही विचार करके देखो प्यारे जगत बना है मन से यह तो बोल देते थे, अब कहीं उस कीर्तन में यह शब्द ही नहीं है तो गुरुदेव बोलते थे जगत बना है मन से फिर कहते मन बना है हमसे हमसे हमसे!!
मन कहां से आया? कहते थे हमसे!