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श्वेत कागज

मैं जीवन को एक कोरे कागज की भांति मानता हूं, जिसमें बहुत कुछ लिखा जा चुका है। किंतु, ऐसा नहीं मानता कि जो लिख दिया गया है, वह मिटाया नहीं जा सकता। यद्यपि, प्रतिदिन कुछ न कुछ लिखा ही जायेगा; किन्तु, मिटाने में कुछ कठिनाई अवश्य होगी। इस तरह अनुभव से गुजरते- गुजरते एक दिन अच्छा लिखने की योग्यता आ जायेगी। एक दिन ऐसा भी आयगा कि प्रतिक्षण लिखते हुए भी कागज कोरा ही बना रह जाएगा। ऐसा होने पर भी लोग पढ़कर लाभ उठा सकेंगे; किन्तु, उसके जीवन में कुछ भी अंकित नहीं रह जाएगा। और जहां अंकित नही रहेगा वही मुक्त विचरेगा। शुद्ध भावना, निश्चल मन, विशाल मन के साथ प्रायः मनुष्य हर दिन कुछ न कुछ नया लिखता है और उसे याद करता, ढोता रहता है। जबकि ब्रह्म समझने के बाद, आत्मा-परमात्मा समझने के बाद, इस नाशी संसार को समझने के बाद याद रखने जैसी कोई चीज ही नही रह जाती। निराकार को कौन याद रखे याद के लिए तो आकार की आवश्यकता है पर यदि हर आकर में जिस दिन तुम मुझ निराकार को ही देखोगे तुम मुक्त मेरे जैसे ही हो जाओगे; कृष्ण का गीता में कहा ये कथन शत प्रतिशत सत्य है…..अस्तु

अवसाद एक स्व निर्मित मनोस्थिति है

प्राचीन धर्म ग्रंथो में ही लोगो के अवसाद ग्रसित होने के वर्णन मिलते रहे हैं। इन वर्णन को श्राप कहकर संबोधित किया गया है। हम महाभारत में देखे तो भरत पुत्र शांतनु भी अवसाद के कारण ही मृत्यु को प्राप्त हुए। पुत्र को राजगद्दी ना देने तथा स्वयं सत्यवती से विवाह कर लेने के कारण उन्हें अवसाद हो गया। वहीं महाभारत युद्ध में यदि श्री कृष्ण ना होते तो अर्जुन भी अवसाद में अा जाते, श्री कृष्ण ने गीता का सार बताकर अर्जुन को अवसाद से उभारा। वहीं महाभारत के रण में अस्वस्थामा के मृत्यु का समाचार सुन कर द्रोणाचार्य भी अवसाद में अा गए थे। रामायण की बात करें तो राजा दशरथ भी पुत्र वियोग में अवसाद से ग्रसित हो गए जिसकारण उनकी मृत्यु हो गई।वहीं मौर्य शासक अशोक कलिंग युद्ध के बाद अवसाद में अा गए और फिर क्या हुआ हम सब जानते हैं। इतिहास में कई ऐसे छोटे – बड़े उदाहरण मिल जायेगे। हमे इन सबसे सीख लेनी चाहिए। केसे इन महान शासको ने खुद को नकारात्मकता से दूर किया।हमे राजा शांतनु की भाती अपने कर्मो का पछतावा करके शोक में रहना है या अर्जुन कि भाती जीना है। हमे राजा दशरथ की भाती पुत्र विलाप करना है या अशोक की भाती जीवन की दिशा बदलनी है ,यह हम पर निर्भर करता है। हमारे जीवन में 30साल केसे निकलते हैं पता ही नी चलता क्योंकि शुरू के 30वर्ष हम अधिक व्यस्त रहते है, खुद को बनाने में। बाकी 30साल कुछ हद तक कठिन होने शुरू होते हैं।जीवन के उतार चढ़ाव में हम कमजोर होने लगते हैं, और धीरे धीरे बुढ़ापा अा जाता है।
हम कह सकते हैं कि अवसाद किसी भी अच्छे इंसान को हो सकता है। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हमे चाहिए कि खुद के लिए भी समय निकालें। भोग तथा इच्छाओं को अपने ऊपर हावी न होने दे। जीवन की बहूमूल्यता को समझे।

जीव को शांति कहां मिलेगी ?

संसार में जो कुछ भी हम प्राप्त करते हैं, वह छूट जाता है। जिन साधनों से प्राप्त करते हैं, वे भी शिथिल हो जाते हैं। देखने में नेत्र असमर्थ हो जाते हैं। सुनने में कान असमर्थ हो जाते हैं। जिस शरीर से हम कुछ पाना चाहते हैं, वह शरीर भी शिथिल हो जाता है। जिस मन से हम कुछ पाया करते हैं, वह मन भी बदल जाता है। क्योंकि, संसार में कुछ भी ऐसा नहीं, जिसके लिए मन कहे कि नहीं छोड़ना। इसीलिए, ऋषियों ने खोजा की जीव को शांति कहां मिलेगी? जो उन्होंने खोजा, अनुभव किया, उसे ग्रंथों में लिखा। पर, हम तब तक उसका लाभ नहीं ले पाते; जब तक कि हमारी समझ में न आए। मोक्ष उस समझ के सिवा और कुछ नही है अगर इसे अनुभव कर लिया तो आप तक्षण मुक्त हो जाते हैं, मोक्ष में ही विचरते हैं। बस यही समझना है कि हम सच में हैं क्या? ये नाक , कान, दृश्य या रसना और ये सब अगर शरीर से खत्म कर दे तो क्या बचेगा जो सुप्त अवस्था में आपके सपनों का साक्षी होता है। उसे जानिए, सोचिये क्योकि इसके अलावा जानने समझने लायक कुछ है ही नही।

छलांग

जो अनेक लोग जंगलों में जाकर प्राप्त करते थे, वह आम गृहस्थ, आम आदमी गुरु कृपा से क्षणों में प्राप्त कर सकता है ।इसमें कठिनाई क्या है?—-बस, आप किसी तल पर जागृत रहना सीख लें। यह प्रयत्न जागृत रहने तक ही करें। फिर जागृत रहें; परंतु जानना न चाहें। जैसे, दृष्टि तो रहे; परंतु देखना न चाहें। कान तो रहें; परंतु सुनना न चाहें। नाक तो रहे परंतु सूंघना न चाहें। मन तो रहे; परंतु कुछ जानना न चाहें, विचारना न चाहें। ऐसा करने से बुद्धि, बाद में इंद्रियां धीरे- धीरे स्वत: ही क्षीण हो जाएगी। अब हमें उनकी जरूरत ही नहीं। जरूरत पर उनके नाम पैदा हो जाते हैं; जरूरत पर ही उनके रूप पैदा हो जाते हैं। जिस समय जानना हुआ उस समय मन खड़ा हो जाता है। परंतु जब आपको लगेगा कि मुझे चेतन वगैरह कुछ नहीं जानना तो अपने आप मन खड़ा नहीं होगा। उस समय के उपरांत आप स्वयं अनुभव करेंगे कि मन गया, इंद्रियां गई, विचार गए।
“न किञ्चिदपि चिन्तयेत्”
अर्थात कुछ भी न सोचें, कुछ भी न चाहें। बिना चाहे, बिना किए “आप” हैं। वहां क्या करना?—
इसीलिए ज्ञानी कहते हैं कि इसके रखने के लिए आप क्या करेंगे?—-आप जो कुछ रखने की कोशिश कर रहे थे, वही बाधाएं थी। बुद्धि रख रहे थे, इंद्रियां रख रहे थे, सुनना रख रहे थे, जानना रख रहे थे, टिकाने में लगे थे कि देखना न खो जाए, सुनना न खो जाए, जानना न खो जाए,अरे! इनको जानें दें। केवल चेतन रहें । अब इसमें क्या है? बस, पड़े रहें, केवल चेतन रहें। कुछ देर बाद पड़े रहने से भी क्या लेना- देना? वह तो जरा सा सहारा है। जैसे, छलांग- बिंदु ( jumping – point ) होता है और पैर उठाकर छलांग लगाते हैं ऐसे ही शरीर तो छलांग के लिए है; छलांग के अलावा इससे भी कोई मतलब नहीं है। मन है एकदम साक्षी, एकदम चेतन। क्या? बस, मन है। मन में खड़े होकर एकदम मन से परे “चेतन” में कूद गए। हो गये चेतन। बस, आप हैं “चेतन” आप हैं “ब्रह्म”। सबमें आप और सबकुछ आपमें यही ब्रह्म है यही भगवान हैं

तत्वज्ञान


काग पलट गुरु हंसा कीन्हें,
दीन्ही नाम निशानी।
हंसा पहुंचा सुखसागर में, मुक्ति भरे जहाँ पानी।।


बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञान्वान्मां प्रपधते ।
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः।।


(जो बहुत जन्मों के अन्त के जन्म में तत्वज्ञान को प्राप्त हुआ ज्ञानी सब कुछ वासुदेव ही है अर्थात वासुदेव के सिवाय अन्य कुछ है ही नहीं, इस प्रकार मेरे को भजता है, वह महात्मा अति दुर्लभ है।)


परमात्मा सब में है, ऐसा जानने वाला महात्मा दुर्लभ है अर्थात महात्मा ही नहीं मिलते। परमात्मा तो सब में है, वर्षों से सुन रहे हैं, परन्तु ऐसा जानने वाला महात्मा, अनुभवी महात्मा ही नहीं मिलता।


कहतें हैं, सब में भगवान ही भगवान है, भगवान के सिवाय कुछ भी नहीं है, यानि सब निन्यानवें प्रतिशत और भगवान एक प्रतिशत? नहीं, ऐसा नहीं, बल्कि “वासुदेवः सर्वमिति”, सब वासुदेव ही है। सब में वासुदेव ही है।


“महात्मा सुदुर्लभः “ऐसा महात्मा ‘सुदुर्लभः’ अर्थात अति – दुर्लभ है। महात्मा दुर्लभ, भगवान सुलभ। भगवान का मिलना दुर्लभ नहीं है, ज्ञानी का मिलना दुर्लभ है हरि का मिलना दुर्लभ नही है, गुरु का मिलना दुर्लभ है। गुरु समय – समय पर मिलतें हैं, हरि तो सदा रहते हैं। गुरु का अभाव हुआ तो भगवान गये और गुरु आये तो किसी की ताकत नहीं कि भगवान चलें जाएं।


शिवे रुष्टे गुरुस्त्राता, गुरौ रुष्टे न कश्चन।
(शिव के रुष्ट हो जाने पर गुरु बचा लेते हैं परन्तु गुरु के रुष्ट हो जाने पर कोई बचा नहीं सकता।)

मैं हूँ



बस इतना ही समझना है। इस मैं और हूँ के के बीच जो कुछ भी है वो तुम नही हो.. तुम सिर्फ हो! और कहाँ नही हो? किसमें नहीं हो? कण कण में तुम, क्षण क्षण में तुम पर तुम कुछ किसी एक को ओढ़ के पहनके अपने आप को वही समझने लगते हो, सीमित “मैं” में सीमित कर लेते हो और अपनी असीमितता को भूल जाते हो…और जन्मों लगा लेते हो स्व स्वरुप में आने को…

अपना होना अनुभव में आते ही “मैं” भाव जागृत हो जाता है। अहम् ज्ञान के जगते ही लगता है कि मैं आदमी हूं , औरत हूं , भाई हूं , बहन हूं , अमीर हूं , गरीब हूं , ऊंच हूं , नीच हूं , सुखी हूं , दुखी हूं , हिंदू हूं और मुसलमान हूं । “मैं हूं” का ज्ञान होने पर अन्य सर्व भाग खड़े होते हैं । “मैं हूं” सुप्त होते ही अन्य सर्व भाव सो जाते हैं । प्रथम स्वयं का होना भासता है ; इसके बाद संपूर्ण संसार का । “मैं” प्रथमाभाष है और “यह” द्वितीयाभाष है । “मैं” बुद्धि सारूप्य जागता है। अतः जैसे विचार होते हैं , वैसा ही “मैं” अनुभव में आता है । बाद में “मैं” के द्वारा अन्य सबका दर्शन होता है । बाद में शरीर का , बैठने का , उठने का और लिटने का भी अनुभव होता है ।
चेतना जब अंदर होती है या सुप्त होती है ; तो शरीर का पता नहीं रहता । अब देखो कि जो तुम्हें अनुभव में आ रहा है , वह तुम नहीं हो । जो अंदर जग रहा है , अनुभव कर रहा है ; वह तुम हो । जो – जो दिख जाए ,भाष जाए , उसका अंदर ही अंदर निषेध करो । यह “मैं” नहीं , यह भी “मैं” नहीं । फिर और , फिर और , फिर और अंदर देखो । जो अनुभव में आए , उसका भी निषेध करो । यह भी नहीं। घुसते जाओ ; घुसते जाओ ; देखते जाओ और निषेध करते जाओ । अंत में , जब सिवाय आपके कोई न बचे, कुछ न बचे , कोई विचार न बचे ; उस निर्विचार में जो बचे , वही तुम हो ।( अविचारा द्विभाषते ) क्योंकि , विचार भी पैदा हुए हैं । वह तुम नहीं हो। विचाराभाव में जो बचता है “सोऽहम्” , बस “सोऽहम” , बस “सोऽहम” , केवल “सोऽहम्” , बस केवल “सोऽहम” । अब “सो” भी नहीं, “हम्” , “हम् “, “हम्” केवल “हम्”। “हम्” भी नहीं , “हूं” , “हूं” , “हूं” बस “हूं” । फिर धीरे – धीरे हूं भी कम , कम और कम । यदि “हूं” भी गायब हो जाए , तो गायब हो जाने दो । रह जाए केवल अस्तित्व , अस्तित्व , सत्, चित् और आनंद । कल्पना नहीं , अस्तित्व । कल्पना नहीं , निर्विकल्प – निर्विकल्प । विचार नहीं , निर्विचार । शांत , मौन रह जाए केवल “है” । खो जाए सब ।
खो गया मन , खो गई बुद्धि, खो गया सब । बच गया कुछ ; बस वही तुम हो ; बस वही तुम हो इसके बाद वही तुम नहीं । सभी तुम हो ; सभी तुम हो ; सभी तुम हो । इस दशा में ठहरो, रुको और जागो । सोचो नहीं मन से ।देखो ! कहीं कोई नहीं है । दिल से बोलो , कोई नहीं है । प्राणों से बोलो , कोई नहीं है । केवल हूं , हूं , हूं । हाथ भी हूं , पैर भी हूं , श्वांस भी हूं , आंख भी हूं , विचार भी हूं । बस “मैं हूं” , “मैं हूं” , “मैं हूं” । बस देखोगे , खो गया सब । जो होना था , हो गया । मैं वही हूं । उसी दशा में मिलूंगा , उसी शून्य में , उसी अकेले में ।
मुझसे मिलना है , तो शुन्य हो जाओ ; मौन में डूबो । मैं वहां ही तुमको सब कुछ दूंगा । जो पूछते हो , उत्तर दूंगा ; प्रेरणा दूंगा ; शक्ति और शांति सब कुछ दे सकूंगा । किंतु , वहां , जहां बस तुम अकेले हो; न हो और कोई ; न हो और किसी का ख्याल । केवल मात्र तुम ; बस तुम ; बस तुम । यही है मेरी उपस्थिति का द्वार । मुझे भी भूल जाओ । बस वहां जो कुछ मिले , वही “मैं” हूं । बस वहीं यह रहस्य खुलेगा कि हम तुम कितने एक हैं । जहां एकता भी नहीं । बिछुड़ने का भी सवाल नहीं । बस एक मात्र “है” है । बस यहीं रुको ; इसी सत्य में जियो ; आनंदित होओ । सब दिखता रहे ; सुनाई देता रहे , फिर भी शांति , फिर भी आनंद । लिखते रहो; पढ़ते रहो ; फिर भी आनंद और जागरण तथा स्थिर चेतना ।


“सा काष्ठा सा परागति:”।।

गुरु की बुद्धि

यह शरीर रथ है, इन्द्रियां घोड़े हैं, मन लगाम है, बुद्धि सारथी है, आत्मा रथी है। चाहे कितना अच्छा रथी हो, यदि सारथी चाहे तो रोड में उतर जाये, गड्ढे में डाल दे। यह बुद्धि तुम्हें मार भी सकती है, गिरा भी सकती है, और बचा भी सकती है और यही बुद्धि तुम्हें लक्ष्य तक पहुंचा सकती है।

यह आत्मा – परमात्मा सारी बातें बुद्धि के हाथ में है। यह बुद्धि ही तो आदमी बना दे या ब्रह्म बना दे। ‘देहोअहम् से शिवोहम्’ बना दे।

“मैं ब्रह्म हूँ” ;यह बुद्धि बनी रहे। जैसे आदमी होना एक समझ से स्वीकारा। मैं पैदा हुआ, बूढ़ा हो जाऊंगा, आदमी के धर्म आपको समझ आ गये। यदि ब्रह्म का समझ आ जाये कि मैं ब्रह्म हूँ तो आप नहीं मरोगे।


परन्तु देहाध्यास जन्म से है और ब्रह्माभ्यास बिना गुरु के नहीं हो सकता। इसके लिए गुरु से “मैं ब्रह्म हूँ” यह समझ आ जाय फिर बार – बार ब्रह्माभ्यास हो सकता है। एक बार यह जानना जरुरी है तभी ध्यान और इसका अभ्यास बढ़ेगा।


मैं होश में हूँ तो दुख – चिंता, मान – अपमान या संसारी विषय आ रहे हैं परन्तु पूर्ण होश होने से ये पता चलते हुए भी विचलित नहीं कर सकते।


गुरु के कृपा द्वारा बुद्धि जाग्रत हो। मैं अपने आप में पूर्ण शुद्ध हूँ। यह सही – सही समझ आ जाये। यही “ज्ञान समाधि” है।


मैं ब्रह्म हूँ, मैं ब्रह्म हूँ ‘शब्द दोहराओगे’ मैं ब्रह्म हूँ ‘का मतलब सर्वत्र मैं हूं, सब में’ मैं ‘हूँ। यह गुरु द्वारा दी हुई बुद्धि के द्वारा ही जाना जा सकता है।

परम सिंधु को प्राप्त करो

जब व्यक्ति अंतरात्मा में लौट आता है, तो वह उस क्षितिज को पा लेता है, जिसको वह बाहर पाना चाहता था। क्षितिज बाहर नहीं है। यदि क्षितिज को छूना है; तो बाहर के द्वार बंद करके बैठ जाओ; चाहे अनुभव करके बैठना; चाहे व्याख्यान सुन कर बैठना; क्षितिज को छू सकोगे, जिसको तुम जिंदगी में कभी नहीं छू सके। यदि छू लिया होता, तो आज उस परम शांति में होते।
बुद्ध ने इसी क्षितिज को छुआ था। शंकर ने इसी क्षितिज को छुआ था। रामकृष्ण परमहंस इसी क्षितिज को छू गए हैं। उनको लगता ही नहीं कि आगे कहीं जाना है। जो इस क्षितिज को नहीं छू पावेगा, उसे लगेगा कि अभी जाना है; अभी जाना है। जैसे नदियां भागती हैं; परंतु, जब परम सिंधु को प्राप्त हो जाती हैं, तो उनका भागना बंद हो जाता है। इसी प्रकार, जब परमानंद सिंधु को पा जाओगे, तब जीवन में और आगे, और आगे बढ़ने की कामना शांत हो जाएगी। केवल जीवन निर्वाह होगा तथा परम शांति होगी

इसीलिए, इस आनंद आत्मसिंधु को पाने के लिए जागरूक रहो । यह काम इसी जीवन में करना है । तुम्ही को करना है । यह तुम्हारा अपना ही काम है——-

“आत्मार्थं पृथ्वीं त्यजेत् ।”

परमार्थ

पुज्य गुरूदेव ने ज्ञान का अनुभव करने के लिए मन को शान्त, निर्मल, खाली करने के लिए उपाय बताऐ हैं…


पुज्य महाराज श्री बताते हैं कि साधक को इस रहस्य को समझना चाहिए कि सब अपने ही किए हुए कर्मों का फल भोगता है। जब उससे ऐसा समरण रहने लगेगा कि मुझे जो मिल रहा है वह मेरे ही पूर्वकृत कर्मो का फल है तो वह राग देष से छूट सकता है।कयोकि मनुष्य सुख देने वाले माध्यम से राग औऱ दुख देने वाले माध्यम से द्वेष करने लगता है। वह भूल जाता है कि माध्यम तो केवल माध्यम है, वह न दुखदायी है और न ही सुखदाई।


पुज्य महाराज श्री समझाते हैं कि प्रत्येक परिस्थिति का सदुपयोग करना चाहिए। दुःख के समय, दुःखी न होकर, भविष्य में कभी पाप न करने का निश्चय करना चाहिए तथा सुख के समय, सुख में डूबने की अपेक्षा, परमार्थ में अग्रसर होना चाहिए।


यह गूढ रहस्य पुज्य गुरूदेव ने हमें समझाया। हमें इसका अभ्यास प्रतिदिन करना है और अपने आप से पूछना है कि कितना हम सफल हुए। अगर मन शान्त, निर्मल, तथा खाली हो तभी उसमें ज्ञान (वचनों) की अनुभूति होती है।
गीता और उपनिषदों में लिखी बात तार्किक लगती है। जबकि अभी सिर्फ संसार ही सत्य लगता है इससे होने वाले सुख दुख ही सत्य लगते हैं। जिस दिन संसार बनाने वाले के बारे में सोचना शुरू कर दिया कि इस समस्त ब्राह्मण को आप जिस पृथ्वी पर हैं उसको आपको थामे कौन है, कौन है जो पचाता है? कौन है जो बड़ा कर रहा है? कौन है जो नींद में भी आपके सपनों की गवाह है? और जब पता चलेगा ये सब तुम हो, तुम्हारा ही अंश है या तुम उसके अंश हो, फिर सागर बूंद में मिले या बूंद सागर में बात बराबर होगी तुम सागर ही हो जाओगे… इस सत्य को धीरे धीरे समझो, समझ न आये पूछो। इसी बहाने सत्संग होगा रहेगा। संगत वैसी बनेगी और आप उस शाश्वत सत्य की खोज कर पाएंगे अपनी खोज कर पाएंगे ….अस्तु

जीवन का सत्य

क्रिया जनित सुख में “राग” ही विषयानंद की वासना है। क्रिया द्वारा मिले हुए सुख का संस्कार मन पर छूट जाता है; फिर उस विषय की चर्चा से, समघटना के दर्शन से या एकांत चिंतन से, क्रिया जनित सुख का पड़ा हुआ संस्कार जाग जाता है। बस यही है “काम”; जिससे फिर उसी कर्म करने की मन में कामना होती है। यदि कामना की पूर्ति की गई, तो पराधीनता, कामना वृद्धि, शक्ति -ह्रास और असमर्थता है। कामना दमित की गई, तो बार-बार याद आएगी और संस्कार गहरा होगा तथा अन्त: में प्रवेश कर जाएगा। अन्त में, ओझल तक हो जाएगा; किंतु, मिटेगा नहीं और फिर कभी न कभी बाहर आएगा। फिर दमन के लिए उतना ही बल प्रयोग करना पड़ेगा।
दमन से संस्कार की मौत नहीं होती या क्रिया जनित सुख का राग – विषासक्ति नहीं मिटती। अतः क्रिया रहित होकर मन में होने वाले संस्कारों को उठने दिया जाए और साक्षी, असंग, शांत और मौन होकर सहज भाव से देखा जाए। उठने वाले संस्कार का न तो रस लिया जाए और न उससे द्वेष किया जाए; तो संस्कार अपने- आप आना बंद कर देंगे। उस स्मृतिशून्य, अप्रयत्न दशा में, जो आनंद स्वयं में मिलेगा; उससे क्रिया जनित सुख का राग मिट जाएगा; विषयासक्ति नहीं रहेगी; तब आवश्यक कर्म स्वत: होने लगेंगे। स्व में, आनंद से पूर्ण दशा में, सहज होने वाले कर्म का नाम ही सदाचार है। आत्मतृप्ति के बिना सदाचार का जन्म हो ही नहीं सकता। आत्मतृप्ति के अभाव में, विषय सुख के प्रति आकर्षण रहेगा। विषयाकर्षण के रहते, विषय का त्याग सदाचार नहीं है; इसे मिथ्याचार कह सकते हैं।

“कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन्
इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचार: स उच्यते।”

इस साक्षी साधना और ध्यान से बड़ी कोई ध्यान-साधना नही है।