बुद्धि दो तरह की होती है- एक सोच-विचार वाली और दूसरी शांत- निर्विचार प्रज्ञा। सुनी हुई बातों में रहित अर्थात् उससे रिक्त और मान्यताओं से खाली हो कर जब बुद्धि शांत हो जाती है, तब वह प्रज्ञा कहलाती है और उस प्रज्ञा में आत्मानुभव हो जाता है। ज्यादा पढ़ने-लिखने से आत्मा का बोध नहीं होता। शब्द-जाल महान् जंगल है; चित्त को भ्रम में डाल देने वाला है। मैं यह नहीं कहता कि मत पढ़ो; पढ़ना पड़ेगा। लेकिन, मैं यह भी कहता हूं कि आदमी थोड़ा सुनकर भी बुद्धि को शांत करें, मन को समाहित करे। क्यों करे? प्रत्येक दर्शन यह कहता है कि असमाहित चित्त, अशांत चित्त, वासना वाली बुद्धि और बहिर्मुख प्रज्ञा से कभी आत्मानुभव नहीं होता। शास्त्र क्या करते हैं? सुना कर बुद्धि को शांत करते हैं। जो ज्यादा सुने ही बिना बुद्धि को शांत कर ले, तो उसे आत्मबोध हो जाएगा। लेकिन, जब तक आदमी तमाम बातें न सुने, तब तक जानने की इच्छा खत्म नहीं होती। मैं तो यह कहता हूं कि परमात्मा के जानने का एक और अच्छा तरीका है कि जानने की इच्छा भी छोड़ो। जब हम परमात्मा को जानने की इच्छा करते हैं, तब हमारी बुद्धि बहिर्मुख होनी शुरू हो जाती है। हम समझते हैं कि परमात्मा कहीं होता होगा- उसको जान लें। जहां हमारी समझ में आया है कि भगवान् वहां है, वहीं उसके पाने की इच्छा और प्रयास शुरू हो जाता है। उसको जानने के लिए और उसको पाने के लिए, जो बुद्धि शांत है, वह चंचल हो जाती है। इसलिए, सुना हुआ परमात्मा और खतरा बन जाता है।
परमात्मा तुम्हारे अंदर ही है, बाहर नहीं.

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