यदि एक बार यह बात अनुभव में आ जाए कि मैं शरीर से संबंध रहित हूं; मन से मेरा कोई संबंध नहीं है; तो यह नहीं है कि संबंध हो गया है और छूट जाएगा। इसलिए गोस्वामी जी बड़ी अच्छी चौपाई कहते हैं—
“जड़ चेतनहिं ग्रन्थि परि गई।
यदपि मृषा छूटत कठिनई।।”
यद्यपि यह झूठी है, अर्थात यदि हम मान ले कि अंतःकरण से आत्मा ढक जाता है, तो फिर छोड़ना अनिवार्य होगा; छोड़ना भी सत्य होगा। लेकिन, गोस्वामी जी की भाषा कहती है कि जड़ और चेतन की गांठ नहीं लगती अर्थात आत्मा का अंतः करण से तादात्म्य भी सच्चा नहीं है। अतः, संबंध भी सच्चा नहीं है। संबंध झूठा है।
आकाश में गंदगी का संबंध झूठा है; आकाश में गंदा होने का भाव झूठा है। प्रतीत तो होता है कि गंदगी हो गई; लेकिन, आकाश उस समय भी गंदा नहीं होता; केवल प्रतीत होता है। ये समस्त जगत एक प्रतीति मात्र है यदि, सचमुच गंदा होता, तो उसे शुद्ध करने का प्रश्न था। इसी प्रकार यह आत्मा, यह जो “मैं” है, जब अंतःकरण के कारण लगता है कि “मैं” कुछ हो गया हूं , तब भी यह आत्मा, हो कुछ नहीं जाता। जब कुछ (गंदा) हो नहीं गया , तो शुद्ध करने की बात ही गलत है, इसीलिए, वेदांत दर्शन यह भी कहता है कि जब यह कुछ नहीं हुआ, तो मुक्ति भी कुछ नहीं है; क्योंकि गंदा न हो, संबंध न हो, तो संबंध छूटे कैसे? ये सबकुछ ओढ़ा हुआ है परवश होके समझा हुआ है अब गुरु सार्वभौमिक सत्य को बता रहे हैं इसे समझो हर रोज़ बार बार समझो जब तक पहले वाले कि तरह ये गाढ़ा ना हो जाए।
जगद् गुरू आद्य शंकराचार्य जी ने माडूक्य उपनिषद का भाष्य किया है । उसी उपनिषद में कुछ कारिकायें हैं । उसमें एक कारिका है—
प्रपञ्चो यदि विद्येत निवर्तेत न संशय:

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6,715 Comments

    1. Vcyncgoryde July 14, 2022 at 4:23 pm

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    1. Lcyncgoryex July 30, 2022 at 2:20 am

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